प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीने 31अक्तूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर आयोजित एक समारोह में अनुच्छेद 370 को रद्द करने के निर्णय को उन्हें समर्पित किया। मोदी ने कहा कि सरदार पटेल अनुच्छेद 370 के विरोधी थे।भाजपा-संघ का जोर इस बात पर रहा है कि अनुच्छेद 370 लागू करने का फैसला देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का था जबकि उनकी सरकार में गृहमंत्री सरदार पटेल इसके विरोधी थे। सच्चाई इसके किस तरह बिल्कुल उलट है, इसे जानना जरूरी है।
अनुच्छेद 370 के ऐतिहासिक परिदृश्य से बात आरंभ करें। शायद इससे शुरुआत करना सबसे अच्छा है कि ब्रिटिश भारत- या जिसे ब्रिटिश राज कहते हैं- दो भिन्न प्रकार की शासन व्यवस्था से बना था। पहला तो सीधे शासित प्रदेश थे और दूसरा, परोक्ष रूप से शासित- या जिन्हें रजवाड़े (प्रिंस्ली स्टेट) कहा जाता था। ये रजवाड़े संख्या में 500 से अधिक थे और वस्तुतः पूरे 1946 और जून, 1947 तक जब विभाजन की योजना की घोषणा की गई, इन रजवाड़ों पर वस्तुतः बहुत ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि सभी लोगों का ध्यान मुख्य प्रदेशों और भारत का क्या होगा, पर था- कि क्या विभाजन होने जा रहा है- और अगर ऐसा है, तो किन शर्तों पर। जब विभाजन की योजना घोषित कर दी गई, रजवाड़ों का महा सामने आया। समय का वहत दवाव था क्योंकि इस मुद्दे को 15 अगस्त, 1947 से पहले हल कर लिया जाना था। (तब तक जून का महीना आ चुका था।) इस वक्त तक साफ हो चुका था कि भोपाल, त्रावणकोर, हैदराबाद और कश्मीर-जैसे कछ बडे रजवाडे किसी तरह की स्वतंत्रता की तलाश कर रहे थे.. और यही वजह थी कि भारत सरकार को वस्तुतः इनसे निबटना था। जो व्यक्ति इस समस्या के आसान और सीधे समाधान के लिए आगे आए, उनका नाम था वीपी मेनन जो गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ काम कर रहे थे। मेनन ने मूलतः कहा कि भारत सरकार के कानून, 1935 के प्रावधानों के आधार पर हम सिर्फ इन तीन विषयों पर सभी प्रदेशों को भारतीय गणतंत्र में शामिल होने को कहें- विदेश मामले, रक्षा और संचार; साथ में यह प्रावधान करें कि अन्य सभी विषयों पर वे संबंधित प्रदेश अपने क्षेत्राधिकार का उपयोग करना जारी रखें और उन्हें यह अधिकार होगा कि वे आगे बढ़ने के लिए क्या करना चाहते हैं। इसी आधार पर अधिकांश प्रदेशों को 15 अगस्त, 1947 से पहले शामिल किया गया।